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मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां…

November 20, 2006

 

आसमां के पार शायद और कोई आसमां होगा

 

आसमां के पार शायद और कोई आसमां होगा

 

बादलों के परबतों पर कोई बारिश का मकां होगा

 

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

 

 

कभी उडता हुआ, कभी मुडता हुआ

 

मेरा रास्ता चला, ओ हो हो हो…

 

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

 

 

मेरे पांव के तले की ये ज़मीं चल रही है

 

कहीं धूप ठंडी ठंडी

 

कहीं छांव जल रही है

 

इस ज़मीं का और कोई आसमां होगा

 

होगा आसमां,

 

आसमां होगा

 

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

 

 

इन लंबे रास्तों पर सब तेज़ चलते होंगे

 

इन लंबे रास्तों पर सब तेज़ चलते होंगे

 

कापी के पन्नों की जैसे यहां दिन पलटते होंगे

 

शाम को भी सुबह जैसा क्या समा होगा

 

होगा क्या समा

 

क्या समा होगा

 

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

 

 

आसमां के पार शायद और कोई आसमां होगा

 

बादलों के परबतों पर कोई बारिश का मकां होगा

 

हो मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

 

 

कभी उडता हुआ, कभी मुडता हुआ

 

मेरा रास्ता चला, ओ हो हो हो…

 

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

 

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां

 

मैं हवा के परों पे कहां जा रहा हूं कहां



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तुझे मिलेगी मधुशाला…

September 3, 2006

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ,
सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी,
सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों,
कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद,
मिल जाती है मधुशाला॥

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अंदर बाहर

August 29, 2006




अंदर बाहर, बाहर अंदर
हम हैं जहां वहां जलवे…
अपनी आंखों में रहते हैं
हरदम जवाँ जवाँ जलवे…